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टिपिकल वुमन को बेड़‍ियों से आजाद करते हैं ये 11 फिल्‍मी किरदार

Updated: Mar 08, 2018 17:00 pm
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1/12स्त्री बनाई जाती है

mother

सिमोन द बोउआर एक लेखिका थीं। उन्होंने लिखा था, ‘स्त्री पैदा नहीं होती, उसे बनाया जाता है।’ कौन बनाता है उसे? सवाल अपने आप में ही जवाब है। समाज का योगदान रहता है। रिवाजों की छत, लज्जा का दरवाजा, रूप की खिड़कियां ऐसे कई मेटाफर मिलकर बनाते हैं… एक स्त्री। वो खुद क्या ही होना चाहे। किसे परवाह। फिल्मों में भी ऐसा ही रहा है। पहले की मां रोती रहती थी। समाज ने करवट ली। मां बदल गई। समय के साथ ऐसे कई फिल्मी किरदार हुए, जिन्‍होंने महिलाओं की टिपिकल छवि को तोड़ा है।

2/12‘मदर इंडिया’ की राधा

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नरगिस दत्त ने ये किरदार निभाया है। इस फिल्म ने भारत की माओं को बदल ही दिया था। वो कुछ भी सहन कर सकती है, अपने संस्कारों से संजोये अपने बच्चे को गलत रास्ते जाते नहीं देख सकती। गोली मार देती है वो बिरजू (सुनील दत्त) को। इसके बाद हालांकि ‘वास्तव’ फिल्म वाली मां भी ऐसा करती है।

3/12‘अर्थ’ में स्मिता पाटिल

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महेश भट्ट की ये फिल्म काफी चर्चित फिल्म है। इसमें शबाना आजमी और कुलभूषण खरबंदा दोनों पति-पत्नी होते हैं लेकिन स्मिता पाटिल इनके रिश्ते में आती है। वो कुलभूषण को स्मिता से छीनना चाहती है। कैरेक्टर थोड़ा ग्रे है। स्मिता ने बखूबी प्ले किया है। जानकारी के लिए बता दें कि स्मिता पाटिल और शबाना आजमी ने इस तरह के काफी अलग रोल प्ले किये। ‘निशांत’ इसका एक उम्दा उदाहरण है।

4/12फिर बदलने लगा दौर

mirch masala

न्यू वेब सिनेमा के दौर में महिलाओं के कैरेक्टर्स पर काफी काम किया जाता था। जहां मेनस्ट्रीम में सिर्फ एंग्री यंग मैन छाए हुए थे, वहीं आर्ट फिल्म हाउस की ओर से ‘मिर्च-मसाला’ जैसी फिल्में बनाई जा रही थी। पर ये फिल्में कम लोग देख रहे थे। फिर दौर बदला। देश की महिलाओं ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाई। लोगों को दिखने लगा कि औरत चुल्हे से परे भी बहुत कुछ है। इस बीच ‘जुबैदा’ जैसी फिल्में आई।

5/12‘देव डी’ वाली कल्कि

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अनुराग कश्यप की फिल्मों में फीमेल कैरेक्टर्स की एक खास अदा दिखती है। ‘देव डी’ की कल्कि कोचलिन का कैरेक्टर सबसे अलग है। वो बिंदास किस्म की है। उसके चेहरे पर एक ही इमोशन रहता है। ‘मुक्काबाज’ में जोया हुसैन भी अलग है। वो नहीं बोल सकती पर फिर भी बहुत बोलती है।

6/12‘हाईवे’ से आलिया भट्ट

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इम्तियाज अली की फिल्मों में से अगर ‘हाईवे’ नहीं देखी तो कुछ नहीं देखा। इस फिल्म में आलिया का किरदार सफर कर रहा है। हिंदी वाला सफर। महावीर भाटी (रणदीप हुड्डा) को वो रास्ते से जान रही है।

7/12‘क्वीन’ वाली रानी

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दिल्‍ली के राजौरी गार्डन की रानी (कंगना रनौट) की राजकुमार राव से शादी होने वाली है। ऐन मौके पर वो छोड़ जाता है। लड़की अकेले ही अपना हनीमून सेलीब्रेट करने निकल पड़ती है। कहां देखने को मिल रहा था ऐसा पहले कहीं। ये नया था। लोगों को पसंद भी आया।

8/12श्रीदेवी… ‘इंग्लिश-विंग्लिश’ से

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एक ऐसी मां जो अंग्रेजी सीखना चाहती है। वो जाती है विदेश… पढ़ाई करने। अपने आप को प्रूव करने की कोशिश। काफी अच्छी फिल्म है। श्रीदेवी जी ने इस फिल्म से दिखा दिया था कि अभी वो बाकी हैं। हालांकि अभी वो हमारे बीच नहीं हैं लेकिन ‘मॉम’ और ‘इंग्लिश-विंग्लिश’ जैसी फिल्में नारी की छवि को तोड़ रही थी।

9/12‘विक्की डोनर’ की दादी और मां

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इस फिल्म में कमलेश गिल ने दादी और डोली आहलूवालिया ने आयुष्मान की मां का किरदार निभाया है। दोनों एकसाथ बैठकर शराब पीती हैं। खुली बातें करती हैं, सास-बहू वाला रिश्ता रहता ही नहीं। दोस्ती है भाई। दोस्ती।

10/12‘कहानी’ से विद्या बालन

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बदला किस तरह से लिया जाता है ये इस फिल्म से देखा जा सकता है। रिवेंज लेने के लिए कैसे प्लान बनाया होता है विद्या ने इसमें ऐसा भारतीय फिल्मों में पहले नही देखने को मिला था।

11/12‘हैदर’ वाली तबू

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तबू ने इस फिल्म में शाहिद कपूर की मां का किरदार निभाया है। वो अपने परिवार से प्यार करती है। विलयम शेक्सपीयर के ‘हैमलेट’ पर बेस्ड है इस फिल्म की स्टोरी। कश्मीर में जिन औरतों के शौहर लापता हैं वो ‘आधी विधवा’ कहलाती हैं। तब्बू का हाल यही है फिल्म में। वो अकेली होती है। शाहिद अपनी मां से जुदा-जुदा रहता है लेकिन अंत का सीन बेहद प्यार है। जब उसके कानों में उसकी मां गुंजती है। तो पता चलता है कि कहानी की जड़ें तबू से भीतर से ही आ रही हैं कहीं।

12/12‘लिपस्टिक अंडर माय बुर्का’ की रत्ना पाठक

Munna Michael First Week Box Office Collection in Hindi | Lipstick Under My Burkha ki Kamai

एक उम्रदराज औरत का किरदार प्ले किया है रत्ना जी ने इस फिल्म में, ऐसी उम्रदराज जिसने शादी नहीं की। उसके अंदर एक 22 साल की लड़की छुपी बैठी है। परिवार के लिए उसने अपनी उम्र तमाम की। पर धीरे-धीरे उसकी उम्र बढ़ नहीं रही बल्कि वो जवान होती जा रही है। तो साहब, ये हैं वो किरदार जिन्होंने अपने आप में महिलाओं की कथित जकड़ी हुई छवि को तोड़ा और ये बताया कि स्त्री का किरदार रंगीन है। कई रंगों से भरा हुआ।