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Romantic Movies: क्या आप भी अपने गर्लफ्रेंड या बॉयफ्रेंड से तंग आ चुके हैं? साथ बैठकर देख डालिए ये 10 फिल्में

Authored by स्‍वपनल सोनल | Hindi Filmipop | Updated: 24 Nov 2022, 3:49 pm

क्या आपकी भी आपकी गर्लफ्रेंड या बॉयफ्रेंड से खिटपिट हो जाती है? क्या आपको भी लगता है कि प्यार करना और निभाना बेहद आसान है? तो फिर यहां हम आपको बॉलीवुड की जिन 10 फिल्मों के बारे में बताने जा रहे हैं, उन्हें अपने पार्टनर के साथ तुरंत देख डालिए।

 
क्या आप भी अपने गर्लफ्रेंड या बॉयफ्रेंड से तंग आ चुके हैं? साथ बैठकर देख डालिए ये 10 फिल्में
क्या आप भी अपने गर्लफ्रेंड या बॉयफ्रेंड से तंग आ चुके हैं? साथ बैठकर देख डालिए ये 10 फिल्में
सिनेमा समाज का सिर्फ आईना नहीं, इसकी पहली पाठशाला भी है। बचपन से लेकर बुढ़ापे तक सिनेमा से हम बहुत कुछ सीखते हैं। हिंदी सिनेमा ने हमें जिंदगी के ना जाने कितने सबक दिए हैं। इनमें सबसे अहम पाठ है प्‍यार का। इसमें कोई दोराय नहीं है क‍ि सिनेमा ने हमें प्‍यार करना सिखाया है। अनारकली और सलीम से लेकर 'बेफिक्रे' धरम और सायरा तक।

प्रेम करना इतना सरल भी नहीं है

बीते 100 साल से अधि‍क समय से सिनेमा हमें प्‍यार का पाठ पढ़ा रहा है, लेकिन उसके मर्म को समझने वाले अभी भी बहुत कम हैं। आम तौर पर 70एमएम का पर्दा हमें प्‍यार का जो रूप दिखाता है, वो रूमानी होता है। लड़का-लड़की मिलते हैं। बारिश होती है। बहारों का समां होता है। प्‍यार होता है। रिश्‍ते और समाज की उलझन होती है, जो सुलझती है। दोनों मिलते हैं और फिल्‍म खत्‍म। लेकिन अफसोस पर्दे के बाहर की दुनिया में प्रेम इतना सरल भी नहीं होता।
प्‍यार सिर्फ रूमानी एहसास नहीं है
असल में प्‍यार करने के लिए मानसिक तैयारी की जरूरत होती है। आप प्‍यार करना चाहते हैं, यह अपने आप में जिंदगीभर के लिए एक ऐसी जिम्‍मेदारी है, जिसमें थकने और ठहरने की गुंजाइश नहीं है। प्‍यार के लिए खुद को तैयार करना होता है, क्‍योंकि यह जिंदगी की सबसे बड़ी परीक्षा है। लायक बनना होता है। रूमानियत से बाहर निकलकर जिम्‍मेदारी उठानी पड़ती है। विपरीत परिस्‍थि‍तियों में भी जूझने और प्‍यार को बनाए रखने की जिम्‍मेदारी।
...क्‍योंकि प्‍यार की कोई एक्‍सपायरी नहीं होती
बहरहाल, ऐसा भी नहीं है कि सिनेमा ने हमें प्‍यार का सिर्फ रूमानी पहलू ही दिखाया और समझाया है। असल जीवन में प्‍यार के लिए जरूरी गुणों से भी हमारा परिचय इसी सिनेमा की दुनिया ने करवाया है। यह अलग बात है कि हम उसे समझ पाए या नहीं। आइए एक नजर डालते हैं उन 10 फिल्‍मों पर जिन्‍हें हर किसी को देखनी चाहिए, क्‍योंकि प्‍यार सिर्फ मौज-मस्‍ती नहीं है। और हां, इसकी कोई एक्‍सपायरी नहीं होती।

गाइड (1965)
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गाइड फिल्म, फोटो: Twitter@BombayBasanti


आरके नारायणन के उपन्‍यास पर बनी यह फिल्‍म प्रेम में समर्पण और खुद को भूल जाने की सीख देती है। एक राजू गाइड है, जिसे शादीशुदा रोजी से प्‍यार हो जाता है। रोजी अपनी जिंदगी से नाखुश है। मरना चाहती है, लेकिन उसमें जीने की ललक है। राजू खुद को भूलकर उस महिला के सपनों को जीने लगता है। रोजी नाचना चाहती है और राजू उसे खुशी से नाचते हुए देखना चाहता है। फिल्‍म में देवआनंद और वहीदा रहमान हैं। वो गीत है ना 'तेरे मेरे सपने अब एक रंग हैं।'

अभिमान (1973)
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अभिमान, फोटो: Twitter


प्रेम में अहंकार की कोई जगह नहीं होती। जलन नहीं होती। 'अभि‍मान' यही सीख देती है। फिल्‍म में अमिताभ बच्‍चन और जया बच्‍चन हैं। कहानी सुबीर और उमा की है। सुबीर फेमस सिंगर है। उमा सीधी-सादी घरेलू लड़की। उमा की आवाज में सरस्‍वती का वास है और यहीं से सुबीर के दिल में सितार बजते हैं। शादी होती है। उमा को भी प्रोफेशनल सिंगर बनने का मौका मिलता है। वह सुबीर से ज्‍यादा प्रसिद्धी पा लेती है। लेकिन सुबीर का अहंकार रिश्‍तों को तार-तार कर देता है। होश आता है तो पता चलता है कि सुकून एक-दूसरे की छांव में ही है। क्‍योंकि, 'अब तो है तुमसे हर खुशी अपनी...'

मैंने प्‍यार किया (1989)
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मैंने प्यार किया


प्‍यार इंसान को जिम्‍मेदार बना देता है। प्‍यार पाने के लिए पहले खुद को साबित करना होता है। प्रेम (सलमान) और सुमन (भाग्‍यश्री) के साथ भी यही होता है। एक अमीर बाप का जवान बेटा। प्‍यार करता है। लेकिन उसे पाने के लिए पिता की दौलत की बजाय अपनी मेहनत का रास्‍ता चुनता है। खुद को साबित करता है, प्‍यार को छीनकर नहीं पाना चाहता। 'दिल दे के दर्द-ए-मोहब्‍बत लिया है, सोच समझ के ये सौदा किया है कि मैंने प्‍यार किया... प्‍यार किया... प्‍यार किया है...'

दिलवाले दुल्‍हनिया ले जाएंगे (1995)
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दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे, फोटो: Twitter


प्‍यार सबको साथ लेकर चलने का नाम है। यह सिर्फ दो लोगों का नहीं, दो परिवारों का मेल है। यह सिर्फ रिश्‍तों की पौध नहीं, फसल है। राज (शाहरुख) और सिमरन (काजोल) की कहानी यही तो बताती है। वर्ना सिमरन सरसों के खेत में राज से कहती तो है कि मुझे यहां से ले चलो राज। लेकिन राज नहीं मानता। आखिरी दम तक, हर तरीके से सबको मनाने में जुटा रहता है। और आखिर में जब प्‍यार मिलता है तो दो परिवार मिलते हैं। दिल मिलते हैं। 'मेहंदी लगा के रखना, डोली सजा के रखना...'

सुल्‍तान (2016)
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सुल्तान, फोटो: YouTube


प्‍यार किसी से भी हो सकता है। लेकिन उसे पाने के लिए जरूरी है कि उसके लायक बना जाए। शहर की पढ़ी और सपनों की उड़ान भर चुकी आरफा (अनुष्‍का) ने गांव के ठेठ सुल्‍तान (सलमान) को पहली बार इनकार ही तो किया था। लेकिन सुल्‍तान के प्‍यार में ताकत थी। वह आरफा के काबिल बनता है। अपनी कमियों से उबरता है। प्‍यार पाता है। सुल्‍तान की कहानी में मर्यादा भी है। बीवी से अलग है। फेमस हो जाता है। पराई औरतें अपना बनाने को भी कहती हैं, लेकिन वो कहता है, 'हमारे यहां इश्‍क की कोई एक्‍सपायरी नहीं होती।'

चलते चलते (2003)
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चलते चलते फिल्म, फोटो: Twitter


राज (शाहरुख) को प्रिया (रानी मुखर्जी) से पहली नजर में प्‍यार हो जाता है। असल जिंदगी में भी ऐसे प्‍यार हो सकता है। लेकिन एक-दूसरे को समझना भी जरूरी है और समझ के साथ रिश्‍तों में समझौता भी। यहां समझौता अगले के सामने झुकना नहीं, बल्‍कि‍ अपनी कमी को मानना। ग‍लतियों को स्‍वीकार करना है। राज और प्रिया की शादी होती है। तौर-तरीके और ढंग से लेकर पसंद-नापसंद अलग-अलग हैं। झगड़े होते हैं। अलग हो जाते हैं। लेकिन प्‍यार की डोर साथ लाती है। दो लोग अलग-अलग होते हैं। मूल यह है कि दोनों साथ रहें और खुश रहें। प्‍यार में हार-जीत नहीं होती। 'तुम पर मरता हूं, मैं सच कहता हूं। मांग के देख लो मुझसे जान... सुनो ना... सुन लो ना।'

साथिया (2002)
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फिल्म साथिया, फोटो: Pinterest


सुहानी (रानी) और आदित्‍य (विवके ओबरॉय) युवा हैं। साथ रहना चाहते हैं। शादी करते हैं। अलग दुनिया बसाते हैं। समस्‍याएं शुरू होती हैं। रूमानी एहसास के आगे वास्‍तविक दुनिया आटे-दाल के भाव से दो-चार करवाती है। लेकिन रिश्‍तों की मौत उसी दिन शुरू हो जाती है, जब गलफमियां और शक की एंट्री होती है। प्‍यार का मतलब विश्‍वास है। एक-दूसरे पर खुद से ज्‍यादा भरोसा। यूं ही किसी के नाम जिंदगी नहीं होती।

सलाम-ए-इश्‍क (2007)
Romantic Movies: क्या आप भी अपने गर्लफ्रेंड या बॉयफ्रेंड से तंग आ चुके हैं? साथ बैठकर देख डालिए ये 10 फिल्में

इस फिल्‍म में प्‍यार की छह कहानियां एक साथ चलती हैं। अलग-अलग तरह की। लेकिन आशुतोष (जॉन अब्राहम) और तहजीब (विद्या बालन) की कहानी सबसे जुदा है। एक हादसे में तहजीब की याद्दाश्‍त चली जाती है। वह आशुतोष को भी भूल जाती है। उससे डरने लगती है। पराया मानती है। लेकिन आशु फिर भी उसके साथ रहता है। आंसुओं की धारा दिल में बसे प्‍यार को बहा नहीं पाती। धीरे-धीरे याद्दाश्‍त तो नहीं लौटती, लेकिन जिंदगी नए सिरे से जरूर शुरू होती है। प्‍यार सिर्फ बीता हुआ कल नहीं। आने वाला हसीन कल भी है और इसके लिए हार नहीं माननी चाहिए।

यू मी और हम (2008)
Romantic Movies: क्या आप भी अपने गर्लफ्रेंड या बॉयफ्रेंड से तंग आ चुके हैं? साथ बैठकर देख डालिए ये 10 फिल्में

यू मी और हम, फोटो: YouTube


अजय (अजय देवगन) और पिया (काजोल) की कहनी प्‍यार को संभालने की सीख देती है। फिक्र करने की जरूरत है, कहने की नहीं। पिया को अल्‍जाइमर है। वह धीरे-धीरे सबकुछ भूल रही है। भविष्‍य के गर्भ में क्‍या है, अजय को पता है। लेकिन वह कभी पिया का साथ नहीं छोड़ता। बीमारी से लड़ने में उसका साथी बनता है। हमेशा फिक्रमंद रहता है। खुद की नींद से ज्‍यादा पिया के सुकून की फिक्र। प्‍यार सिर्फ पाने का नहीं, साथ निभाने का नाम है।

लाइफ इन ए मेट्रो (2007)
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प्‍यार करने की कोई उम्र नहीं होती। यह तो उम्र से परे है। इस फिल्‍म में भी कई कहानियां हैं। लेकिन जहां नजर टिकती है वो है अमोल (धर्मेंद्र) और श‍िवानी (नफीसा अली) की। 70 की उम्र हो चुकी है। दोनों जीवन में अकेले हैं। इस उम्र में प्‍यार को दुनिया क्‍या कहेगी, दोनों को इससे फर्क नहीं पड़ता। आखिरी लम्‍हा कभी भी आ सकता है। दोनों पहले प्रेमी हुआ करते थे। दिल में प्‍यार अभी भी है। प्‍यार में परवाह सिर्फ प्रेमी की होती है। बाकी दुनिया गौण है। आखि‍री क्षण तक। तभी तो प्‍यार है और यही तो प्‍यार है।