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Funny NO Logic Film Facts: फिल्‍में देखते हैं तो इन बातों पर कभी मत कीजिएगा यकीन, पागल बना रहे हैं सब के सब!

Edited by स्‍वपनल सोनल | Hindi Filmipop | Updated: 24 Nov 2022, 3:03 pm

फिल्‍में तो हम सभी देखते हैं। आज से नहीं बचपन से देख रहे हैं। लेकिन क्‍या आपने कभी गौर किया है कि ये फिल्‍म वाले हमें कितना पागल बनाते हैं। ऐसे लॉजिक दिखाते हैं, जिसमें लॉजिक का ल तक नहीं है। अगर आप भी फिल्‍में देखते हैं तो इन 11 बातों पर कभी भरोसा नहीं कीजिएगा।

 
फिल्‍में देखते हैं तो इन बातों पर कभी मत कीजिएगा यकीन, पागल बना रहे हैं सब के सब!
फिल्‍में देखते हैं तो इन बातों पर कभी मत कीजिएगा यकीन, पागल बना रहे हैं सब के सब!
हम्म, फिल्में... वही जो हमें जानकारी देती हैं, हमारा मनोरंजन करती हैं। रीयल दुनिया से परे एक अलग दुनिया बना देती हैं। बंदा अपने आप को हीरो समझने लगता है। बाइक दौड़ता है। धूम टाइप फीलिंग आती है। जिम जाता है, गाने सुनता है। पता नहीं इंसान से क्या-क्या करवा देती हैं फिल्में। आज हम आपको कुछ ऐसी बातें बताने जा रहे हैं, जिनसे 100 साल का सिनेमा आज भी हमारा Fool बना रहा है।
1. सिर्फ मूंछ लगाने और आंखों पर मास्‍क से वेश बदल जाता है
आपने कई ऐसे सीन देखे होंगे, जिनमें हीरो या दूसरे को सभी से छुपना होता है। अब कोई बताए कि मात्र एक मूंछ से आंखों पर मास्‍क लगा लेने से या फिर बड़े-बड़े बालों से सबको कैसे चकमा दे सकता है। खासकर हीरोइन को या परिवारवाले को, कोई हीरो को नहीं पहचान पाता है। ऐसे मामलों में तो हद ही हो जाती है।
2. साथ सोने से बच्‍चा नहीं हो जाता, बायलॉजी है भाई ये
अक्‍सर देखा गया है। आज भी ऑन कर लो टीवी या कोई ना कोई पुरानी फिल्म आ रही होगी। दो फूल मिलेंगे। अगले दिन से हीरोइन हीरो के बच्चे की मां बनने वाली होती है। इतना ही नहीं, हीरो-हीरोइन एक कमरे में साथ में सो गए, सुबह पता चलता है कि वह प्रेग्‍नेंट है। अरे, चिल्ल कर भाई। इतनी जल्दी क्या है। आखिर हीरो ने एक ही दिन में इतना सटीक प्रेम कैसे कर लिया। ऐसा है बायोलॉजी हमने भी पढ़ी है।

3. क्लोरोफॉर्म वाली बेहोशी
फिल्‍मों में किसी को बेहोश करने के लिए क्‍लोरोफॉर्म सूंघा देते हैं। जबकि असल में क्‍लोराफॉर्म की बेहोशी कुछ देर के लिए होती है, वो भी अच्‍छी खासी मात्रा में सूंघने पर ऐसा होता है। जबकि फिल्मों में थोड़ी सी मात्रा भी कई-कई घंटों तक इंसान को बेहोश रखती है। इसके पीछे से बहुत कुछ हो जाता है। एक समय के लिए उसकी याद्दाशत चली जाती है। फिर धीरे-धीरे उसे सब याद आता है। ओह, कहां हूं मैं।

4. प्लास्टिक सर्जरी से आवाज और बॉडी कैसे बदलती है?
प्लास्टिक सर्जरी करवाने के बाद हीरो का चेहरा तो बदलता ही है, लेकिन पूरी बॉडी की रूपरेखा ही बदल जाती है। नए चेहरा तो मिला, पर शरीर के बाकी हिस्से कहां से नए मिले। कोई लंबा हो गया, कोई नाटा हो गया। और तो और आवाज भी बदल जाती है। वैसे फिल्मों से होकर यह आइडिया आजकल टीवी सीरियल्स में भी काफी प्रयोग किया जाता है। कोई तो सच बता दो इन्‍हें।

5. वकालत तो जैसे हर कोई कर देता है शुरू
‘दामिनी’ फिल्म में सनी देओल, ‘ऐतराज’ में करीना कपूर, एक लंबी लिस्‍ट है ऐसी फिल्मों की। एक्‍टर-एक्‍ट्रेस कभी भी उठकर वकील बन जाते हैं। कहीं भी वकालत शुरू हो जाती है। जबकि वकालत के लिए कितनी पढ़ाई करनी होती है ये दुनिया जानती है।

6. ऐसे हैकर कहां मिलते हैं?
ओह हो, क्या हैकिंग सिस्टम चला है आजकल फिल्मों में। जिनको हैकर बनाया जाता है या तो वो ज्यादा पतले होते हैं या फिर ज्यादा मोटे। कुछ भी हैक कर लेते हैं ये। ज्यादातर ये फिल्मों में आलसी दिखाए जाते हैं। हैकिंग तो ऐसे दिखाते हैं, जिसमें घर बैठे बंदा ट्रैफिक लाइट पर लगे कैमरे से लेकर अमेरिका में एफबीआई तक के दफ्तर को हैक कर ले। कई बार तो सैटेलाइट भी हैक करवा देते हैं। कुछ तो रहम करो। डिजिटल इंडिया है। सबको इतना पता है।

7. हैंडपंप तो ठीक है, पर पाइप कहां है?
जब हैंडपंप लगाया जाता है तो नीचे कई फुट गहरा पाइप डाला जाता है। सनी देओल ने ‘गदर’ में हैंडपंप उखाड़ दिया। लेकिन उसमें पाइप नहीं था। कहीं ऐसा तो नहीं अशरफ अली (अमरीश पुरी) ने वो पाइप पहले ही हटवा दिया हो?

8. गोली लगी, पानी में गिरा, बच गया हीरो
ओफ्फो! गोली लग गई। कोई नहीं हीरो पानी में गिर गया। ऊपर से लंबे-चौड़े गुंडे गोलियां चला रहे हैं। कोई भी हीरो के पीछे नहीं कूदता। हीरो हर फिल्म में तैरता है। गुंडों ने तैरने वाला कोर्स नहीं कर रखा। एक भी गोली उसे नहीं लगती। दुनिया समझती है वो चल बसा, लेकिन वो जिंदा होता है। जाने, पानी में कौन सी दवा है, जो गोली के जख्‍म और जहर दोनों को भर देती है। सही कहा ना?

9. जब अचानक उड़ने लगती हैं गाड़ि‍यां
कार जा रही है। एक कैरेक्टर दूसरे कैरेक्टर का पीछा कर रहा है। कई गाड़‍ियों की बीच में टक्कर होती है। जमीन पर चल रही गाड़ियां आसमान में उड़ने लगती हैं। ये तो ग्रेविटी के सिद्धांत के बिलकुल उलट है। दुर्घटना हमने भी देखी है। भयंकर वाली। लेकिन ऐसे गाड़ि‍यों को उड़ते नहीं देखा कभी। शिट यार।

10. विलेन की सौ गोलियां और हीरो की एक
आपने 'केजीएफ चैप्‍टर 2' देखी होगी। वो भी सीन देखा होगा, जहां रॉकी के लोग दर्जानों ऑटोमैटिक हथ‍ियार से अधीरा की टुकड़ी पर गोलियां बरसाता है। लेकिन अधीरा को छोड़कर बाकी सब को गोली लग जाती है। जबकि वह सामने खड़ा था सबके। खैर, यह तो मिथुन चक्रवर्ती के काल से चला आ रहा है। वह तो साइकिल के पीछे छुपकर विलेन को गोलियां मारते थे। विलेन की गैंग के कई गुंडे हीरो को गोलियां मारते हैं। हीरो को कुछ नहीं होता। वो एक भी गोली जाया नहीं करता। हर निशाना बिलकुल सटीक।

11. फाइट सीन में गुंडे एकसाथ हमला क्‍यों नहीं करते
एक और बात है, जब समझ से परे है। जब भी कोई फाइट सीन होता है। हीरो को 10 गुंडे घेर लेते हैं। लेकिन गौर कीजिए वो हमला कैसे करते हैं। एक गुंडा मारता है, जब तक वह गिर नहीं जाता, दूसरा गुंडा हमला नहीं करता। अरे भाई, जब देख रहे हो कि तुम्‍हारे गैंग का एक पिट रहा है तो इतने में पीछे से जाकर चार लोग हमला कर दो हीरो पर। कौन सा ईमान-धर्म का वास्‍ता है तुम्‍हें कि एक-एक कर के ही पिटोगे।