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Begum Jaan Review: समझ आती है, दिल में नहीं उतरती

Updated: Apr 13, 2017 19:45 pm
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बेगम जान रिव्यु

बेगम जान

रेटिंग:

3.5/5

कास्‍ट:

विद्या बालन, इला अरुण, गौहर खान, पल्लवी शारदा, चंकी पांडे, आशीष विद्यार्थी, रजित कपूर और नसीरुद्दीन शाह

डायरेक्‍टर:

श्रीजीत मुखर्जी

समय:

2 घंटे 15 मिनट

जॉनर:

ड्रामा

लैंग्‍वेज:

हिंदी

समीक्षक:

मीणा अय्यर (टीओआई)

1/6कहानी

देश को आजादी मिली है। बॉर्डर कमीशन के चेयरमैन सर सीरिल रेडक्लिफ तय करते हैं कि भारत और पाकिस्तान को न्यायोजित ढंग से बांटा जाए। हालांकि इस पूरी प्रक्रिया में प्रशासन यह ध्यान नहीं देता कि सरहद की लकीर बेगम जान के वेश्यालय के बीचों-बीच गुजरती है। यानी एक हिस्सा भारत और दूसरा हिस्सा पाकिस्तान।

2/6समीक्षा

फिल्म की कहानी और दौर वो है, जो आजादी के 70 साल बाद भी लोगों में उत्सुकता पैदा करती है। विभाजन। यही नहीं, फिल्म विभाजन के दंश और खौफ से अधिक बेगम जान के उत्साह का गुणगान करती है। एक ऐसी महिला जो मासूम उम्र में विधवा हो जाती है। जिसे वेश्यालय में बेच दिया जाता है। वैसे, यह फिल्म 2015 में बनी श्रीजीत मुखर्जी की ही फिल्म ‘राजकहिनी’ का हिंदी रीमेक है।

3/6इसिलए राज करती है ‘बेगम जान’

बेगम जान यानी विद्या बालन की फिल्म की नायिका और नायक दोनों है। राजा से लेकर प्रशासन और आम जनता, सभी बेगम जान के वेश्यालय में अपनी क्षुधा मिटाते हैं। बेगम इसी के बूते इलाके पर राज करती है। लेकिन रेडक्लिफ लक्ष्मण-रेखा खींच देते हैं।

4/6डायलॉग्स में बजेंगी तालियां

विद्या बालन किरदार में पूरी तरह डूबी हुईं नजर आती हैं। बेगम के हर डायलॉग पर सिटी बजेगी ये तय है। हालांकि, इस कारण लेखक-निर्देशक की फिल्म की बाकी बातों में रुचि थोड़ी खराब भी जान पड़ती है। फिल्म में कई सीन ऐसे हैं, जो हम पहले भी देख चुके हैं। मसलन, अपने ग्राहक को खुश करते हुए एक वेश्या छत को एकटक निहार रही होती है बेसुध। या फिर बच्चे को लेकर वेश्याओं का भावुक हो जाना, क्योंकि सभी पहले मां हैं बाद में वेश्याएं।

5/6कहीं दिलचस्प, कहीं कमजोर

हालांकि बेगम का साहस दर्शकों में भी साहस का संचार करता है। फिर बात चाहे अपने देह की रक्षा की हो या अपने वेश्यालय की सीमाओं की, वह बंगाल की शेरनी जैसी दिखती है। लेकिन प्रशासनिक अधिकारियों, इंडियन नेशनल कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच बातचीत या फिर कार्डबोर्ड कटआउट जैसी चीजें सतही जान पड़ती हैं। सिनेमेटोग्राफर ने भारत-पाकिस्तान के विभाजन को क्लोजअप और हार्फ फ्रेम में उतारने की कोशिश की है, जो असरदार नहीं है।

6/6एक फ्रेम में 11 औरतें, शोर तो होगा ही

फिल्म में होली वाला गीत और उसके दृश्य अच्छे लगते हैं। बाकी 11 औरतों का एक फ्रेम में दिखना किसी शोरगुल वाले उत्सव जैसा जान पड़ता है। हालांकि विद्या बालन का फिल्म में होना सबसे बड़ी यूएसपी है। वो एक साहसी अभिनेत्री हैं और अपने बूते फिल्म चलाने का माद्दा रखती हैं। उनके इस साहस को अलग से आधा स्टार दिए जाने की जरूरत है।