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Kaalakaandi Review: असरदार एक्‍ट‍िंग के आगे बेअसर कहानी

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कालाकांडी मूवी र‍िव्‍यू

कालाकांडी

रेटिंग:

2.5/5

कास्‍ट:

सैफ अली खान, अक्षय ओबरॉय, विजय राज, दीपक डोबरियाल, ईशा तलवार, अमायरा दस्‍तूर, कुणाल कपूर

डायरेक्‍टर:

अक्षत वर्मा

समय:

1 घंटे 52 मिनट

जॉनर:

थ्र‍िलर / कॉमेडी

लैंग्‍वेज:

हिंदी

समीक्षक:

रेणुका व्‍यवहारे

1/7कहानी

‘कालाकांडी’ की कहानी मुंबई में एक रात से शुरू होती है। असल में यहां एक नहीं, तीन कहानियां हैं। सभी समानांतर रूप से साथ चलती हैं। एक आदमी है, जिसे अपनी जानलेवा बीमारी के बारे में पता चलता है। वह तय करता है कि अपने सिद्धांते को किनारे रख अब जिंदगी के बाकी बचे पल को जिंदादिली से जिया जाए। एक औरत है, जो हिट एंड रन केस में शामिल है। वह इससे छुटकारा चाहती है। और दो बदमाश भी हैं, जिनकी सबसे बड़ी समस्‍या यह है कि वो एक-दूसरे पर भरोसा करें या नहीं।

2/7समीक्षा

Kaalakaandi Movie Review in Hindi

अक्षत वर्मा ने ‘देल्‍ही बेली’ की कहानी लिखी थी। अब उनकी ‘कालाकांडी’ का प्‍लॉट मुंबई है। फिल्‍म की कहानी ऐसे किरदारों के इर्द-गिर्द घूमती है, जिन्‍हें सही और गलत काम करना है। लेकिन साथ ही आश्‍चर्य भी करना है कि उन्‍होंने जो किया वो सही है या नहीं। कहानी आकर्षि‍त करती है। यदि आप कोएन भाइयों की डार्क ह्यूमर फिल्‍मों के प्रशंसक रहे हैं, तो आपको यह देखकर अच्‍छा लग सकता है कि भारतीय फिल्‍ममेकर्स भी अब इस विधा में हाथ आजमा रहे हैं। ‘कालाकंडी’ में सैफ अली खान के अनोखे अवतार को पेश करता, दिल को छूने वाला वह अजीब सा ट्रैक इसी उपलब्धि का वसीयतनामा है।

3/7कायदे की जिंदगी, जिंदगी के कायदे

सैफ का किरदार एक ऐसे आदमी का है, जिसने हमेशा एक संजीदा और कायदे की जिंदगी जीने का प्रयास किया। लेकिन फिर अचानक एक दिन उसे पता चलता है कि वह कैंसर से पीड़‍ित है। अब इस आदमी को एहसास होता है कि उसने अपनी जिंदगी सही होने के चक्‍कर में बर्बाद कर दी। लिहाजा वह जिंदगी के बाकी बचे दिनों में उन ख्‍वाबों को पूरा करने निकलता है, जिसकी इच्‍छा हमेशा उसके मन में रही। इसमें एक किन्‍नर महिला (नैरी सिंह) के शरीर को लेकर उसकी जिज्ञासा और उत्‍सुकता भी शामिल है।

4/7दर्द और मन में दबी आजाद का खयाल

फिल्‍म में एक जगह सैफ कहते हैं, ‘हमको आपके सामान के बारे में क्‍यूरियोसिटी है।’ यकीन मानिए फिल्‍म में यह सुनने में अपमानजनक नहीं लगता। हालांकि थोड़ी हंसी आती है। एक टूटे हुए इंसान के रूप में सैफ का किरदार बुझा-बुझा सा भी लगता है और उसी पल आजाद भी। दर्शक के तौर पर आप उसके दर्द को भी महसूस करते हैं और वर्षों से दिल में दबे आजाद होने के खयाल को भी।

5/7सामाजिक मानदंड और असमानता

Kaalakaandi Movie Review in Hindi

फिल्‍म में सैफ अली खान और नैरी सिंह के बीच बेहतरीन बॉन्‍ड‍िंग दिखाई गई है। यह भारतीय सिनेमा के इतिहास में विचित्र क्षणों में जरूर स्‍थान बनाएगी। वे दोनों आपको याद दिलाते हैं कि लैंगिकता पर ध्यान केंद्रित क्यों किया गया है और यह भी कि मानव संबंध सामाजिक मानदंडों और असमानता से परे है।

6/7…और फुस्‍स हो जाती है फिल्‍म

सैफ के कजन के रूप में अक्षय ओबरॉय अच्‍छे लगे हैं। विजय राज अपने काम में माहिर हैं। लेकिन प्रशंसा करनी होगी सैफ अली खान की, जिन्‍होंने एक बोल्‍ड विषय और कैरेक्‍टर का चुनाव किया। ‘कालाकांडी’ के पास हालांकि देने के लिए कुछ नहीं है। फिल्‍म की शुरुआत जिस थ्र‍िल के साथ होती है, आगे बढ़ते ही उसकी हवा निकल जाती है।

7/7छाप छोड़ने में नाकाम है कहानियां

फिल्‍म में साथ चल रही बाकी दो कहानियां छाप छोड़ने में नाकाम साबित होती हैं। उनमें ना तो भावनाएं और ना ही रोमांच ही बन पाता है। यदि आप धैर्य के साथ फिल्‍म देखते भी हैं तो असल में इसके बाद बात करने के लिए आपके पास कुछ नहीं होता। प्रयोगधर्मी सिनेमा के नाम पर यह आपको मजाक ही जान पड़ता है।